दुर्ग में हाल ही में घटी एक अत्यंत दुखद घटना ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया अरुण कुमार जी टाटिया और उनके पुत्र पंकज जी टाटिया ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली जानकारी के अनुसार इसके पीछे शारीरिक अस्वस्थता, अकेलापन, अवसाद और गंभीर आर्थिक कठिनाइयाँ जैसे कारण हैं।
जैन समाज को सामान्यतः देश के सबसे समृद्ध और संगठित समाजों में गिना जाता है बड़े मंदिरों का निर्माण, भव्य धार्मिक आयोजन, विशाल चातुर्मास और सामाजिक कार्यक्रम इन सबके कारण यह समाज बाहरी दृष्टि से अत्यंत संपन्न और सशक्त दिखाई देता है।
लेकिन हर समाज की तरह इस समाज के भीतर भी कुछ ऐसी सच्चाइयाँ छिपी होती हैं जो मंचों और आयोजनों की चमक में दिखाई नहीं देतीं समाज के भीतर ही कई परिवार ऐसे हो सकते हैं जो आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं कुछ लोग बीमारी, अकेलेपन और मानसिक तनाव से गुजर रहे होते हैं।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि ऐसे लोग अक्सर अपनी परेशानी खुलकर व्यक्त नहीं कर पाते स्वाभिमान, संकोच और सामाजिक प्रतिष्ठा की भावना उन्हें अपनी पीड़ा छिपाने के लिए मजबूर कर देती है बाहर से सब सामान्य दिखाई देता है, लेकिन भीतर एक व्यक्ति धीरे-धीरे टूटता चला जाता है और वह समाज तक नहीं पहुंच पाता समाज को एक ऐसी व्यवस्था विकसित करनी चाहिए कि समाज उन तक पहुंच चुके ।
आज का समय केवल आर्थिक समृद्धि का नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन का भी है धन होने के बावजूद यदि व्यक्ति अकेला महसूस करता है, यदि उसके पास अपनी बात कहने वाला कोई नहीं है, तो जीवन की कठिनाइयाँ कई गुना बढ़ जाती हैं।
ऐसी परिस्थितियों में समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है समाज केवल धार्मिक कार्यक्रमों और आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए समाज का वास्तविक उद्देश्य अपने प्रत्येक सदस्य के सुख-दुख में साथ खड़ा होना है।
समाज को यह प्रयास करना चाहिए कि वह ऐसे लोगों की पहचान करे जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं, जो बीमारी या अकेलेपन से जूझ रहे हैं, या जो मानसिक तनाव में जी रहे हैं यदि समय रहते उन्हें सहारा मिल जाए चाहे वह आर्थिक सहायता हो, भावनात्मक समर्थन हो या केवल आत्मीय संवाद तो कई जीवन बचाए जा सकते हैं।
इसके साथ ही समाज को ऐसे प्रकल्पों पर भी विचार करना चाहिए जहाँ अकेले रह रहे बुजुर्ग या संकट में पड़े लोग सामूहिक रूप से रह सकें ऐसे स्थान जहाँ वे एक दूसरे के साथ समय बिता सकें, अपने अनुभव साझा कर सकें और जीवन में फिर से आशा और अपनापन महसूस कर सकें।
यह भी एक विचारणीय विषय है कि जैन समाज धार्मिक कार्यों और आयोजनों में बड़ी मात्रा में धन खर्च करता है। मंदिर निर्माण, चातुर्मास, धार्मिक आयोजन ये सब हमारी आस्था और परंपरा का हिस्सा हैं और उनका महत्व भी है।
लेकिन यदि इन आयोजनों में थोड़ी सादगी अपनाकर कुछ संसाधनों को समाजोपयोगी प्रकल्पों में लगाया जाए जैसे अस्पताल, विद्यालय, सहायता कोष या सामूहिक आवास तो समाज के कई जरूरतमंद लोगों के जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है।
किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति उसके भव्य आयोजनों से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने कमजोर और संकटग्रस्त सदस्यों के साथ कितना संवेदनशील व्यवहार करता है।
दुर्ग की यह दुखद घटना हमें एक अवसर देती है रुककर सोचने का, आत्ममंथन करने का और यह समझने का कि समाज की समृद्धि का वास्तविक अर्थ क्या है।
यदि हम अपने आसपास के लोगों के दर्द को पहचान सकें, समय रहते सहायता का हाथ बढ़ा सकें और अपने समाज को केवल संपन्न ही नहीं बल्कि संवेदनशील भी बना सकें तो शायद भविष्य में किसी परिवार को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े।
समाज तभी सचमुच मजबूत होता है जब उसके सबसे कमजोर सदस्य भी सुरक्षित और सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें अंततः किसी भी समाज की सच्ची पहचान उसके मंदिरों की ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसके दिलों की गहराई से होती है।