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दावोस में महाराष्ट्र सरकार का 30 लाख करोड़ रुपये के निवेश का दावा केवल झूठ और फरेब: कांग्रेस

नई दिल्ली, 23 जनवरी : कांग्रेस ने दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान महाराष्ट्र सरकार द्वारा किए गए 30 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश के दावों पर कड़े सवाल खड़े किए हैं। पार्टी ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा पिछले तीन वर्षों में करीब 50 लाख करोड़ रुपये निवेश आने का दावा किया गया है, जो महाराष्ट्र की जीडीपी के बराबर है। पार्टी ने इन आंकड़ों को वास्तविकता से कोसों दूर बताते हुए कहा कि इतने अधिक निवेश का जमीनी स्तर पर कोई ठोस परिणाम दिखाई नहीं देता।

नई दिल्ली स्थित कांग्रेस कार्यालय में पत्रकार वार्ता करते हुए महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता अतुल लोंढे पाटिल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर फर्ज़ी आंकड़ों के जरिए जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सरकार बताए कि असल में कितनी कंपनियों ने महाराष्ट्र की धरती पर उत्पादन का काम शुरू किया है।

उन्होंने विस्तार से बताया कि पिछले तीन सालों में 50 लाख करोड़ रुपये के अलावा 2018 में भी ‘मैग्नेटिक महाराष्ट्र’ सम्मेलन में 16 लाख करोड़ रुपये का निवेश आने का दावा किया गया था। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि अगर सचमुच इतना निवेश हुआ है तो महाराष्ट्र का 10 लाख करोड़ रुपये का ऋण खत्म हो जाना चाहिए, किसानों का कर्ज माफ हो जाना चाहिए और ‘लाडकी बहिन’ योजना में महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपये की जगह 2,100 रुपये मिलने चाहिए, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है।

अतुल लोंढे पाटिल ने महाराष्ट्र सरकार से पूछा कि उसके द्वारा साइन किए गए एमओयू में से कितने प्रोजेक्ट वास्तव में जमीन पर उतरे हैं। कितनी कंपनियों ने उत्पादन शुरू किया, कितने रोजगार पैदा हुए और कितनी कंपनियां वास्तव में रजिस्टर्ड व लिस्टेड हैं। उन्होंने दावा किया कि 70 से 80 प्रतिशत कंपनियां न तो लिस्टेड हैं और न ही उनकी आर्थिक क्षमता इतनी है कि वे समझौता ज्ञापन के अनुसार निवेश कर सकें। उन्होंने यह सवाल भी किया कि एमआईडीसी, सिडको और एमएमआरडीए के पास कितनी जमीन उपलब्ध है और महाराष्ट्र सरकार ने उद्योग लगाने के लिए कितनी कंपनियों को जमीन दी है।

लोंढे पाटिल ने कुछ उदाहरण देते हुए बताया कि कई कंपनियों की वास्तविक पूंजी बहुत कम है, लेकिन उन्होंने हजारों करोड़ रुपये के एमओयू किए हैं। उन्होंने कहा कि नमन बिल्डर्स (हर्ष शाह) ने लगभग 1,500 करोड़ रुपये का एमओयू किया, लेकिन उनकी इतनी आर्थिक क्षमता है ही नहीं। इसी तरह सौरभ बोरा की कंपनी की वैल्यू 4,500 करोड़ रुपये है, लेकिन एमओयू 45,000 करोड़ रुपये का किया गया। उन्होंने बताया कि कोंकण के दीघी पोर्ट में 2,500 एकड़ की जमीन अब तक बेची नहीं जा सकी है और विदर्भ में 1,000 एकड़ के टेक्सटाइल पार्क का काम भी आगे नहीं बढ़ पाया है। उन्होंने नागपुर में ‘स्मार्ट सिटी’ प्रोजेक्ट का जिक्र करते हुए कहा कि 10 साल बीत जाने के बावजूद स्मार्ट सिटी कहीं नजर नहीं आती है। उन्होंने आगे कहा कि महाराष्ट्र में उद्योगों को देश की सबसे महंगी बिजली मिल रही है, जिससे निवेश और औद्योगिक विकास प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा कि रोजगार सृजन, निजी निवेश और औद्योगिक विकास के मोर्चे पर महाराष्ट्र सरकार पूरी तरह विफल रही है। आज हालात यह हैं कि पुणे जैसे औद्योगिक केंद्रों से उद्योग दूसरे राज्यों में जा रहे हैं।

तेलंगाना, तमिलनाडु और कर्नाटक का उदाहरण देते हुए अतुल लोंढे पाटिल ने कहा कि इन राज्यों की सरकारों ने दावोस में अपनी स्पष्ट औद्योगिक नीतियां पेश कीं, जबकि महाराष्ट्र सरकार ने केवल निवेश के बड़े-बड़े आंकड़े गिनाए। उन्होंने कटाक्ष करते हुए यह भी पूछा कि क्या देवेंद्र फडणवीस खुद को इतना कुशल साबित कर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पेश करना चाहते हैं?

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