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सम्मान और उपाधि देने से पहले पात्रता का विचार करना क्यों आवश्यक है – नितिन जैन

समाज में किसी भी व्यक्ति को दिया गया सम्मान, पदवी या विशेष दर्जा केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं होता, बल्कि वह उस व्यक्ति के व्यक्तित्व, उसके आचरण, उसके योगदान और उसके जीवन मूल्यों की सार्वजनिक स्वीकृति होता है। इसलिए जब भी समाज, संस्था या कोई समूह किसी व्यक्ति को कोई विशेष दर्जा देता है, तो वह केवल उस व्यक्ति को सम्मानित नहीं करता बल्कि यह भी तय करता है कि समाज किन गुणों और किन मूल्यों को सर्वोच्च मानता है। इसी कारण यह अत्यंत आवश्यक है कि किसी को भी कोई दर्जा देने से पहले यह गंभीरता से विचार किया जाए कि वह व्यक्ति वास्तव में उस सम्मान का अधिकारी है या नहीं।

आज के समय में दुर्भाग्य से कई बार यह देखने में आता है कि सम्मान और उपाधियाँ वास्तविक पात्रता के आधार पर नहीं, बल्कि प्रचार, भीड़, प्रभाव, पदलोलुपता, व्यक्तिगत संबंधों या क्षणिक उत्साह के आधार पर बाँट दी जाती हैं। जब ऐसा होता है तो सम्मान का वास्तविक मूल्य कम होने लगता है। समाज के सामने यह संदेश जाता है कि उपाधियाँ और पदवी अब त्याग, तपस्या, सेवा और चरित्र के आधार पर नहीं बल्कि प्रभाव और प्रचार के आधार पर मिलती हैं। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत चिंताजनक होती है।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि सच्चे सम्मान हमेशा उन लोगों को मिले जिन्होंने अपने जीवन को किसी बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित किया। चाहे वह धर्म के क्षेत्र में हो, समाज सेवा के क्षेत्र में हो, शिक्षा, राष्ट्र सेवा या मानव कल्याण के क्षेत्र में हो—हर जगह वही लोग वास्तव में सम्मान के पात्र बने जिन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और सत्य के लिए कार्य किया। ऐसे लोगों को मिला सम्मान समाज को प्रेरणा देता है, नई पीढ़ी को आदर्श देता है और समाज की नैतिक शक्ति को मजबूत करता है।

लेकिन जब किसी ऐसे व्यक्ति को बड़ा दर्जा दे दिया जाता है जिसका आचरण, चरित्र या कार्य उस सम्मान के अनुरूप नहीं होता, तब सबसे बड़ा नुकसान समाज की विश्वसनीयता का होता है। लोग सम्मान और उपाधियों को गंभीरता से लेना बंद कर देते हैं। योग्य और तपस्वी लोग उपेक्षित महसूस करते हैं और समाज में एक प्रकार की निराशा और अविश्वास का वातावरण बनने लगता है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सम्मान देना केवल एक भावनात्मक निर्णय नहीं होना चाहिए। इसके पीछे विवेक, सत्य और निष्पक्षता का होना आवश्यक है। किसी व्यक्ति की लोकप्रियता, उसके समर्थकों की भीड़ या उसके द्वारा किए गए बड़े-बड़े दावों को देखकर तुरंत उसे ऊँचा दर्जा देना बुद्धिमानी नहीं है। इसके बजाय उसके जीवन के वास्तविक कार्यों, उसके व्यवहार, उसके सिद्धांतों और समाज के प्रति उसके योगदान का गंभीरता से मूल्यांकन करना चाहिए।

यदि समाज इस मूल सिद्धांत को अपनाता है तो सम्मान की गरिमा बनी रहती है। जब योग्य व्यक्ति को सम्मान मिलता है तो वह सम्मान समाज के लिए प्रेरणा बन जाता है। लेकिन जब गलत व्यक्ति को सम्मान दिया जाता है तो वह सम्मान भी विवाद और उपहास का कारण बन जाता है। इसलिए यह प्रत्येक जागरूक व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि वह सम्मान और उपाधियों के विषय में गंभीरता से विचार करे और समाज को भी इसके प्रति सचेत करे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सम्मान और पदवी को केवल औपचारिकता या दिखावे का साधन न बनने दें। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो व्यक्ति जिस दर्जे का अधिकारी है, वही उसे प्राप्त करे। तभी सम्मान का वास्तविक मूल्य बना रहेगा और समाज में सत्य, चरित्र और सेवा के आदर्श मजबूत होंगे।

अंततः यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि सम्मान देने से पहले थोड़ी सी सावधानी और विवेक पूरे समाज की गरिमा को बचा सकता है। इसलिए किसी को भी कोई दर्जा देने से पहले यह अवश्य सोच लेना चाहिए कि वह वास्तव में उस सम्मान का हक़दार है या नहीं।

लेखक : नितिन जैन, संयोजक – जैन तीर्थ श्री पार्श्व पद्मावती धाम, पलवल (हरियाणा)

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