बिगड़ती हिंदी मातृभाषा से चिंतित होकर दिगम्बर जैन समाज के सबसे बड़े संत आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी और ग्रहमंत्री अमित शाह जी सहित केंद्र सरकार के सभी मंत्रियों के प्रति अपनी पीड़ा व्यक्त की है।
यह जानकारी देते हुए बाल ब्रह्मचारी सुनिल भैया और मीडिया प्रभारी राहुल सेठी ने बताया की आचार्य श्री की पीड़ा सिर्फ़ हिंदी भाषा को लेकर है। आचार्य श्री के चिंतित विचारों को उक्त पत्र में ब्रह्मचारी सुनिल भैया के माध्यम से केंद्र सरकार को पहुँचाया गया है। उक्त पत्र में यह उल्लेख किया गया है की वर्तमान केंद्रीय सरकार द्वारा प्रस्तावित नई शिक्षा नीति 2020 को समर्थन के पीछे एक ही भाव अवचेतन में चल रहा था कि इससे हिंदी और अन्य प्रांतीय भाषाओ के माध्यम से शिक्षण देने की बात कही थी। इसी परिपेक्ष में कस्तूरीरंगन समिती को हिंदी और अन्य मातृ भाषाओ के माध्यम से शिक्षण एवं इनके सार्वजनिक प्रयोग में आवश्यक सावधानी बरतने का सुझाव दिया गया था। मगर दुर्भाग्य से देश मे सामान्य एवं अथवा विशिष्ट वर्ग लोग सार्वजनिक संवाद में अंग्रेजी भाषा के शब्दों का चलन कम नही हो रहा है।
बल्कि चिंता का विषय है कि नई शिक्षा नीति के प्रवर्तन के बावजूद भी अंग्रेजी शब्दों का व्यापक प्रचलन बढ़ रहा है। यह चूक, लापरवाही या गलती आगे चलकर भारी पड़ने वाली है। क्या हिंदी एवं अन्य प्रांतीय भाषाओ के कोष इतने गरीब है की उन्हें अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा से शब्दों को उधार लेना पड़ता हैं? आखिर क्या कारण है कि हिंग्रेजी या हिंगलिश का जादू हमारे मस्तिष्क से नहीं उतर रहा है? जब तक हम नई पीढ़ी को शिक्षण संवाद में अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग को पढ़ाते रहेंगे, यह समस्या खत्म नही होगी। आज सामान्य संवाद में भी अंग्रेजी शब्द सिर चढ़कर बोलते है, उदारहण के तौर पर स्कूल जाओ, वाटर लाओ, लाइट ऑन कर दो, ऑनलाइन प्रोग्राम चल रहा है। क्या फ्रांस, जर्मनी, जापान, चीन, इजराइल की जनता और उनके नेता अपने संवाद में इस प्रकार की खिचड़ी का प्रयोग करते है? अगर नही करते तो हम लोग ऐसा क्यों कर रहे है? सामान्य तौर पर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हैं, जिसके दीर्घकालिक गंभीर परिणाम भुगतने पढ़ेंगे, भाषाई स्तर और सांस्कृतिक स्तर पर भी।
इस देश का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनैतिक नेतृत्व को भी अपने भाषाई संस्कारो में अंग्रेजी शब्दो का बहिष्कार करना चाहिए अन्यथा हिंदी और अन्य प्रांतीय भाषाएं कभी मुख्य धारा में अपना स्थान नही बना पाएगी।
खास तौर पर जब इस महान राष्ट्र के प्रधानमंत्री अथवा महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने भाषणों अथवा व्यक्तत्व में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करते है, तो मुझे बहुत पीड़ा होती है। मुख्य रूप से सर्वोच्च राजनीतिक पदों पर बैठे व्यक्तियों तथा प्रधानमंत्री एवं मंत्री मंडल के सहयोगी अथवा राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री और उनकी नौकरशाही को सबसे ज्यादा सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। शब्दो के प्रयोग और चयन को लेकर, क्योंकि सामान्य वर्ग इनका अनुकरण करता है, अगर यह वर्ग इसी प्रकार अपने व्यक्तत्व एवं संवाद में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग करता रहेगा तो शिक्षा नीति अपने मूल उद्देश्य को कभी प्राप्त नही कर पाएगी।
जिस प्रकार वर्तमान महामारी ने गंगा को शुद्ध कर दिया है, उसी प्रकार नई शिक्षा नीति को वाक शुद्धि पर बल देना होगा, एक वाक- गंगा शुद्धि अभियान की राह देख रहा है। मुझे बताया गया है कि 10 देशो ने भारत की शिक्षा नीति की प्रशंसा की है, और उसे अपनाने का आग्रह किया है, इसका मुख्य आधार हिंदी एवं अन्य मातृ भाषाओ में शिक्षण देने का विचार रहा है, इसलिए हमारी वैश्विक जिम्मेदारी बनती है कि हम किसी भी स्तर पर अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग न करे और जरूरत पड़ने पर ज्यादा से ज्यादा हिंदी और अन्य प्रांतीय भाषाओ के शब्दों को अपने कोष में जोड़े।

