कांग्रेस के कानून, मानवाधिकार एवं आरटीआई विभाग के चेयरमैन और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इस फैसले ने जितने सवालों के जवाब दिए हैं, उससे कहीं अधिक नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
कांग्रेस मुख्यालय में पत्रकार वार्ता को संबोधित करते हुए सिंघवी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार नागरिकता के विषय में अंतिम निर्णय लेने वाली संस्था चुनाव आयोग नहीं है। नागरिकता अधिनियम के तहत इसका निर्णय सक्षम प्राधिकारी, मुख्य रूप से गृह मंत्रालय द्वारा ही किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि फैसले में यह भी स्पष्ट है कि चुनाव आयोग इस विषय को केवल प्रशासनिक रूप से संभाल सकता है।
सिंघवी ने कहा कि फैसले में उल्लेख है कि जहां नागरिकता का सवाल उठेगा, वहां चुनाव आयोग को मामला सक्षम प्राधिकारी को भेजना होगा और उसका निर्णय बाध्यकारी होगा। उन्होंने सवाल किया कि जब नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है, तो देश के विभिन्न राज्यों में करीब 7.5 करोड़ लोगों को नागरिकता का निर्णय होने से पहले ही मतदाता सूची से कैसे बाहर किया गया।
उन्होंने कहा कि करोड़ों लोगों का मताधिकार ऐसी संस्था द्वारा कैसे छीना जा सकता है, जिसके पास नागरिकता तय करने का अधिकार ही नहीं है। सिंघवी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पैरा 97 से 101 तक देखने पर स्पष्ट होता है कि SIR प्रक्रिया में चुनाव आयोग की ओर से गंभीर खामियां थीं और उनमें सुधार इसलिए संभव हुआ क्योंकि राजनीतिक दल और एनजीओ अदालत पहुंचे।
सिंघवी ने बिहार का उदाहरण देते हुए कहा कि राज्य में 65 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही हटाए गए नाम दोबारा प्रकाशित किए गए और नाम हटाने का कारण बताना पड़ा। उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों में राजनीतिक दलों को हाईकोर्ट द्वारा प्रक्रिया में पक्षकार बनाया गया, जिसके बाद बीएलए और पैरालीगल वॉलिंटियर्स को शामिल किया गया।
उन्होंने आरोप लगाया कि इससे साफ है कि चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया जल्दबाजी और खामियों के साथ चलाई। सिंघवी ने कहा कि इतनी बड़ी विसंगतियों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की गंभीर कमियों पर कोई सख्त टिप्पणी नहीं की।
SIR की समयसीमा पर सवाल उठाते हुए सिंघवी ने कहा कि बिहार में इस प्रक्रिया के लिए सिर्फ चार महीने और पश्चिम बंगाल में पांच महीने का समय दिया गया। उन्होंने पूछा कि जब प्रक्रिया में करोड़ों लोग शामिल थे, तो चुनाव आयोग ने इतनी जल्दबाजी क्यों की। उन्होंने कहा कि यदि यही प्रक्रिया चुनाव से एक वर्ष पहले शुरू की जाती, तो आम जनता को इतनी परेशानी नहीं होती।
सिंघवी ने कहा कि चुनाव आयोग की प्रक्रिया में सबसे बड़ी विसंगति यह रही कि पहले मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और उनके दावों व अपीलों पर निर्णय बाद में आया। इस बीच चुनाव संपन्न हो गए, जिससे लाखों नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रह गए। उन्होंने सवाल किया कि चुनाव हो जाने के बाद ऐसे फैसले का औचित्य क्या रह जाता है।

उन्होंने आधार कार्ड और राशन कार्ड को लेकर भी सवाल उठाया। सिंघवी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में आधार और राशन कार्ड को नागरिकता का प्रमाण मानने से इनकार किया है। ऐसे में चुनाव आयोग द्वारा सूचीबद्ध जन्म प्रमाण पत्र, माता-पिता के जन्म प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र और 10वीं की मार्कशीट जैसे दस्तावेज भी नागरिकता के प्रमाण नहीं माने जा सकते। इसके बावजूद SIR की पूरी प्रक्रिया इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर चलाई गई।
पश्चिम बंगाल का उल्लेख करते हुए सिंघवी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने आंतरिक आदेशों के माध्यम से एक व्यवस्था बनाई, जिसके तहत हटाए गए लोगों को अपील का मौका मिला। उन्होंने दावा किया कि छह हजार अपीलों में चार हजार अपील स्वीकार की गईं। उन्होंने कहा कि यदि बड़ी संख्या में लोगों को गलत तरीके से हटाया गया था और बाद में उनकी अपीलें स्वीकार हुईं, लेकिन चुनाव तब तक खत्म हो चुके थे, तो यह पूरी चुनावी प्रक्रिया और परिणामों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
सिंघवी ने कहा कि SIR जैसी प्रक्रिया लोकतंत्र के मूल अधिकार यानी मताधिकार से जुड़ी है। इसलिए इसे जल्दबाजी, अस्पष्टता और अधूरी जवाबदेही के साथ लागू करना करोड़ों नागरिकों के अधिकारों पर सीधा असर डालता है।

