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क्रोध करने का हमें कोई अधिकार नहीं है -डॉ निर्मल जैन

किसी ने गाली दी, अपमान किया, झूठे आरोप लगाए, कटु शब्द सुनाए, हमारी निंदा की, हमारे किसी संपत्ति को हानि पहुंचाई, हमारे साथ शारीरिक बल प्रयोग किया, हमारे धन को हड़प लिया। इस तरह की दूसरे लोगों द्वारा की गई सारी हरकतों को हम क्रोध का निमित्त कहते हैं। लेकिन प्रकृति इस बात से सहमत नहीं होती। इन सारी घटनाओं, कारणों को क्रोध का निमित्त नहीं मानकर वह तो इन सारे अवसरों को क्षमा का ही निमित्त मानती है। इतना सब कुछ सहन करना हो, त्रास हो तो गुस्सा तो आना स्वभाविक ही है लेकिन फिर भी कर्मसत्ता इस क्रोध को स्वाभाविक मानकर स्वीकार नहीं करती। उसका विधान है कि जो कुछ सहन करना पड़ता है उस सब क्षमा का ही निमित्त है। हमें तो छमा ही धारण करनी है, क्रोध करने का हमें कोई अधिकार नहीं है। कर्म सत्ता कहती है कि न्याय करना मेरा काम है संसारी व्यक्तियों का अधिकार क्षेत्र नहीं है। संसार जिसे क्षम्य माने वह क्रोध मेरे कानून में क्षम्य नहीं है। मेरे कानून में तो क्रोध मात्र अक्षम्य ही है।

नुकसान और नफा के बाजार अलग-अलग नहीं होते हैं। नफा बाजार में, दुकान में और नुकसान घर में होता है ऐसा भी कभी नहीं होता। जहां नफा होता है वहां नुकसान की संभावना होती है। उसी प्रकार क्षमा और क्रोध के बाजार अलग-अलग नहीं होते। जो अवसर क्रोध के होते हैं वही अवसर क्षमा के होते हैं। अन्य व्यक्ति के जैसे व्यवहार और स्वभाव पर हमें क्रोध आता है ऐसे ही व्यवहार और स्वभाव पर क्षमा की भी जरूरत होती है। जब व्यापारी अपना नफा-नुकसान का हिसाब लगाता है तब अपनी वही खाते को ही जाँचता है पड़ोसी दुकानदार की बही क्या बताती है वह इस बारे में न देख सकता है ना सोचता है। कर्म सत्ता भी जब हमारा न्याय करने बैठती है तो वह सिर्फ हमारे कर्मों का लेखा-जोखा ही पढ़ती है किसी और का नहीं। औरों ने क्या किया है यह तो जब उनका नंबर आएगा तब देखा जाएगा इस समय तो हमारी फाइल खुली हुई है। उसमें अगर हमारा क्रोध दिखाई दे रहा है तो कठोर दंड मिलेगा, इसके विपरीत अगर हमने विषम परिस्थितियों में क्षमा धारण की है तो प्रकृति हमें भव्य पुरस्कार से पुरस्कृत भी करती है। दुख सहने के सभी अवसर क्षमा के ही अवसर हैं क्रोध के नहीं। प्रकृति से पुरस्कार पाने की की कामना है तो क्षमा के अतिरिक्त कोई और साधन नहीं है। क्रोध का भी अपना एक महत्व होता है. अगर कोई ऐसा कृत्य न करें जिससे कि हमें क्रोध आए तो क्षमा का आविर्भाव ही,हमें क्षमा का प्रशिक्षण ही ना मिले। इसलिए हमें समझ लेना चाहिए कि गाली, अपमान, कटु शब्द यह सब क्षमा के पाठ सिखाने के साधन हैं, क्रोध के नहीं।


“ क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा भूत है, क्षमा भविष्य है, क्षमा तप है, क्षमा पवित्रता है, क्षमा ने ही संपूर्ण जगत को धारण कर रखा है। ~ वेदव्यास

अपने दुश्मन को आप जो सबसे अच्छी चीज दे सकते हैं वो है क्षमा, किसी ने हमारे प्रति अपराध किया, हम उसे सजा ही देते रहें। हमारे किसी अपराध की हमें सजा ही मिलती रहे। तो इन दोनों स्थिति में क्या हम अपने मन की शांति और प्रसन्नता बनाये रख सकेंगे? आज इस भागती दुनिया में हमारा मानसिक संतुलन सही है तो उसका श्रेय क्षमा और प्रेम को जाता है । मन मैं क्षमा भाव स्थिर करने का एक बहुत बड़ा लाभ यह भी है कि जब कोई हमें अपमानित करता है, या क्रोध दिलाने का कोई कृत्य करता है तब मात्र उसके कहने से हमारा रक्तचाप या हमारी रक्त शर्करा प्रभावित नहीं होती। लेकिन ऐसे प्रसंग पर जब हम क्रोध करना शुरू कर देते हैं तब हमें हमारे मन और तन पर यह दोनों विकार हमें अस्वस्थ बना देते हैं। इसलिए कोई हमारे साथ कितना भी दुर्व्यवहार कपट छल करें हमें पूर्णता निर्मल निष्पाप बने रहना है। बीमार को देखकर स्वयं बीमार हो जाना बुद्धिमानी नहीं है।

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