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नए साल की  तारीख भले ही विदेशी, लेकिन उत्सव-भाव स्वदेशी

डॉ. निर्मल जैन (जज से.नि.)

नव वर्ष दुनिया भर में हर देश, समुदाय, नगर और परिवार के लिए एक विशेष अवसर रहा है। क्योंकि यह एकमात्र ऐसा अवसर है जिसे किसी भी जाति, समुदाय और जातीयता के बावजूद मनाया जाता है। नव वर्ष के स्वागत  का तरीका जो भी हो लेकिन मन में भावना एक ही रहती है कि आने वाला साल जीवन में खुशियां लेकर आए। पुरानी यादों को छोड़कर नए साल में एक नई शुरुआत करना चाहते हैं। फिर वो 1 जनवरी हो अथवा भारतीय संस्कृति चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा से नव संवत्सर से शुरू होने वाला वर्ष का प्रथम दिन या जैन विचारधारा का दीपावली के अगले दिन से वीर निर्वाण संवत हो।

हर समुदाय का जश्न मनाने का अपना तरीका होता है। जैन समुदाय पर्युषण पर्व के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण त्योहार दीपावली के अगले दिन से वीर निर्वाण संवत को नए साल के रूप में परिवार ही नहीं संपूर्ण जीव मात्र के कल्याण और सौभाग्य के लिए विभिन्न पूजाओं का आयोजन करके मानते हैं।  महावीर का जीवन एक खुली किताब है। उनका जीवन ही सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह  और मानवता का संदेश है। एक नयी परिपाटी प्रारंभ करें। क्यों न साल की  तारीख भले ही विदेशी हो लेकिन इस बार महावीर के चरण चिन्हों पर चलते हुए उत्सव का भाव स्वदेशी रखें।  नए साल में संकल्प लें कि महावीर की तरह लंगोटी तो त्याग नहीं सकते फिर भी अपनी कामनाओं पर अंकुश रख, साधन-शुद्धि से धनार्जन के साथ जनोपयोगी कार्यों में विसर्जन भी करें। तभी असमानता दूर होगी और महावीर का यह सूत्र कि सब जीवों में आत्मा समान है, संसाधनों पर सबका समान अधिकार है फलित होगा। हमारी प्राथमिकताएं ऐसी हों कि अपनी थाली में उतनी ही सामग्री रखेंगे कि किसी की थाली खाली न रह जाये। नए साल की स्वर्णिम सुबह होते ही इस सोच को बिसरा दें कि हर तिजोरी में एक रुपया कम है और हर घर में एक कमरा कम।

महावीर के अनुगामी बनकर क्यों न हम अपनी  अहिंसा, अनेकांत, परस्परोपग्रहो जीवानाम् की परंपरा निभाते हुए 1 जनवरी को  शुरू होने वाले नए साल को  एक अनूठे तरीके से मनाएँ।  नए साल  के  जश्न में उन लोगों को भी शामिल करें, जो कभी नए साल का उत्सव नहीं मना पाते। कुछ झोपड़पट्टी इलाकों, अनाथालयों, शिशु गृहों, वृद्धाश्रम जैसे से इलाकों में जाकर भी जश्न मनायेँ, इससे हमारे साथ कुछ और लोगों को भी खुशी मिलेगी तो हमें भी महावीर का अनुगामी होने पर गर्व होगा।

नए साल की शुरुआत प्रकृति को सहेजने के साथ की जाये। धर्म के साथ पर्यावरण की  सुरक्षा भी, प्रदूषण से मुक्ति भी। जैन दर्शन अनुसार वनस्पति में भी जीव है। कुछ नए वृक्ष, पौधे लगायें। घर का हर सदस्य एक पौधा लगाए और उसकी खुशी मनाई जाये, चाहें तो इनके नाम रख सकते हैं इनसे दोस्ती कर सकते हैं। इनके साथ जब भी खड़े होंगे  हम आत्मिकता तो महसूस करेंगे ही साथ में  आंतरिक खुशी भी।

मादक एवं हिंसक भाव के जनक उत्पादों से दूरी बनाएँ रखें। नए परिवेश में व्यस्तताएं बढ़ी  है, पर अपनों को भी समय दें। स्वस्थ रहने और अहिंसक वृत्ति अपनाते हुए पूर्ण शाकाहारी बनें।  बच्चों को भी बोलें कि वो अपने लिए नए साल के लिए अपने रेजोल्यूशन / संकल्प खुद बनाएं और हां जो शुरू किया है उसे पूरा भी करें।  एक दिन का जश्न मनाने के बजाए, कुछ ऐसा प्लान करें जो हमें  साल भर खुशी की  अनुभूति बनी रहे।अपनों  के साथ साल भर के लिए कुछ तीर्थ दर्शन और पर्यटन की योजनाएं बनाएं। जिसमें मस्ती से लेकर, घूमना-फिरना, और धर्मलाभ भी मिले, अपनी धार्मिक प्राचीन धरोहरों को उनके इतिहास को भी जानें।

अब बीता हुआ साल तो कोई बदल नहीं सकता पर हाँ हम अपने आने वाले  कल अच्छा कर सकते हैं। नया संकल्प लें और उसे अंत तक निभाने की शपथ उठाएँ। बीते साल में जो कुछ राग-द्वेष उपजा उसे भूल कर क्षमा भाव धारण कर अपने शांत और निराकुल कल के लिए कटिबद्ध  हो जायें। ऐसे मनाएँ नया साल पर कलेंडर ही न बदले सब कुछ जो अप्रिय है बदल कर नया हो जाए, प्रिय हो जाए।

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