शिक्षा, संस्कारों से गुरु जीवन का निर्माण करते हैं : आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

देव दर्शन, अभिषेक ,पूजन के लिए मंदिर का निर्माण किया जाता है। देव शास्त्र के बाद गुरु का नंबर आता है, निवाई दिगंबर जैन समाज ने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी का गुरु मंदिर बनाया है। आचार्य श्री शांति सागर जी ने धर्म के प्रचार प्रचार में दीक्षा के बाद दक्षिण भारत से उत्तर भारत कर्नाटक से सम्मेद शिखर के लिए भ्रमण कर धर्म का प्रवर्तन किया ।आचार्य श्री शांति सागर जी के जीवन में त्याग, सहनशीलता, वाणी में मथुराता, क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य सोच संयम आदि 10 धर्म को जीवन में अपनाया और उतारा।

उन्होंने अपने गुणों का मान अभिमान नहीं किया। सरलता के साथ चरित्र धर्म का उज्जवल संदेश देश समाज को दिया। यह मंगल देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी के 21 फीट के स्मारक के लोकार्पण दो दिवसीय अनुष्ठान के अवसर पर प्रगट की राजेश पंचोलिया इंदौर के अनुसार आचार्य श्री ने आगे उपदेश में बताया कि गुरु के बिना जीवन शुरू नहीं होता है, गुरु ही धर्म की रक्षा करते और करवाते हैं। आचार्य श्री शांति सागर जी ने जिनवाणी ,जिन मंदिर को सुरक्षित कर बच्चों को गुरुकुल के माध्यम से धार्मिक शिक्षा दिलाकर संस्कारित कराया। शिक्षा और संस्कार से जीवन का निर्माण होता है शिक्षा से परिवार सुरक्षित होता है। गुरु का आशीर्वाद हमेशा फलदाई होता है संस्कारों से स्वयं के साथ अन्य का जीवन भी परिवर्तित होता है। जैन स्कूलों में लौकिक शिक्षा के साथ धार्मिक शिक्षा भी देना चाहिए प्रथम पट्टाचार्य श्री वीर सागर जी ने कचनेर में स्कूल का संचालन कर बच्चों को संस्कार और धार्मिक शिक्षा दी ।धार्मिक शिक्षा और संस्कार से जीवन सुरक्षित रहता है। प्रतिदिन देव दर्शन अभिषेक पूजन करना श्रावक का प्रथम कर्तव्य है। संस्कार के बिना उच्चशिक्षा निरर्थक है।

राजेश पंचोलिया इंदौर

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