पश्चिम एशिया संकट के कारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों, राजनेताओं, प्रशासन सभी से कुछ विशेष कदम उठाने का आग्रह किया है । पेट्रोल, डीजल और ऊर्जा का उपयोग समझदारी और संयम से करने की सलाह दी है । एक साल तक सोने की अनावश्यक खरीदारी न करने का संकल्प लेने को कहा गया है, ताकि विदेशी मुद्रा बचाई जा सके । पेट्रोल, डीजल, गैस की मितव्यता के लिए कोविड काल की तरह ‘वर्क फ्रॉम होम’ और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग जैसे उपायों को फिर से अपना कर व्यक्तिगत कारों के बजाय मेट्रो का उपयोग करने और कार-पूलिंग को बढ़ावा देने का सुझाव दिया है । हमारे प्रधान मंत्री जी ने हमसे कुछ भी नयी अपेक्षा नहीं की है केवल जनमानस की भाषा में हमारी पुरानी संस्कृति जैन विचारधारा के संयम, अपरिग्रह और परिग्रह परिमाण व्रत को व्यावहारिक रूप देने को कहा है ।
यह तीनों सिद्धान्त हमें सीमित संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की सीख देते हैं । ताकि अन्य जीवों को कष्ट न हो । प्रधानमंत्री द्वारा गाड़ियों के काफिले को 24 से घटाकर 2 करना और पेट्रोल-डीजल पर गैर-जरूरी खर्च घटाने की सलाह देना इसी संयम का एक रूप है। आकांक्षाओं पर अंकुश, अपरिग्रह और परिग्रह परिमाण व्रत केवल एक आध्यात्मिक विचार नहीं बल्कि *प्रशासनिक अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी माध्यम है। यह केवल भौतिक वस्तुओं के त्याग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरी मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति है। यह हमें अपनी शर्तों पर जीने और आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
जैन धर्म में में गृहस्थ के लिए परिग्रह परिमाण व्रत या ‘इच्छा परिमाण व्रत’ का मुख्य उद्देश्य अपनी इच्छाओं और संपत्ति के संग्रह पर एक स्वेच्छा से सीमा निर्धारित करना है। उस सीमा से अधिक प्राप्त होने पर वह उसका त्याग कर देना है या उसे लोक-कल्याण में लगा देना है। यह तीनों सूत्र “असंतोष” को खत्म कर “संतोष” जगाते हैं । आर्थिक विषमता कम होती है अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और तनाव से मुक्ति मिलती है। इनका स्पष्ट संदेश है कि चीजें हमारे उपयोग के लिए हैं, हम चीजों के दास नहीं हैं । परिग्रह परिमाण व्रत केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह “अनासक्ति” का एक व्यावहारिक अभ्यास है। अनासक्ति का अर्थ ‘वैराग्य’ या सब कुछ छोड़कर जंगल चले जाना नहीं है । यह जीवन से भागना भी नहीं, बल्कि इच्छाओं, परिणामों और वस्तुओं से निर्लिप्त रहकर, मानसिक शांति और संतुलन के साथ जीने की एक दार्शनिक और व्यवहारिक स्थिति है। इसका अर्थ है ‘जुड़ाव के बिना भागीदारी’। दुनिया में रहें, रिश्ते निभाएं, व्यवसाय करें, लेकिन अपनी खुशी या शांति को किसी बाहरी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के आधीन न होने दें। “कमल के पत्ते” की तरह रहें जो पानी में रहकर भी खुद को गीला नहीं होने देता। पारिवारिक, सामाजिक और देश हिट को “मेरा साम्राज्य” समझने के बजाय अपना “कर्तव्य” समझना है। अपनी खुशी को सुविधाओं या वस्तुओं से न जोड़ें । वस्तुओं का आनंद लें, लेकिन उन्हें अपनी पहचान न बनने दें । एक अनूठी जीवन शैली “न अभाव में जीना न किसी के प्रभाव में जीना केवल अपने स्वभाव में जीना “।
यह एक मानसिक अवस्था है जहाँ कर्म तो पूरी निष्ठा से करते हैं, लेकिन उसके परिणाम से खुद को इतना नहीं बाँधते कि वह मानसिक शांति छीन ले । शत-प्रतिशत योगदान देने पर भी यदि इच्छित परिणाम न मिले तो टूटना नहीं हैं । अपितु यह समझना कि संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है । हम वस्तुओं का उपयोग तो करें, पर उनके गुलाम न बनें । बल्कि सब कुछ होते हुए भी उसमें न फँसना है । जो भी अप्रिय परिस्थिति है उसका समाधान तलाशें लेकिन उसे कोसें नहीं । पदार्थों के प्रति अनासक्त होना यह एक मानसिक अवस्था है जहाँ कर्म तो पूरी निष्ठा से करते हैं, लेकिन उसके परिणाम से खुद को इतना नहीं बाँधते कि वह मानसिक शांति छीन ले । अपरिग्रह को आत्मसात करना ही राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने का एकमात्र विकल्प है। यदि सरकारी स्तर पर संसाधनों के संचय को कम किया जाता है, तो उन बचे हुए संसाधनों का उपयोग कल्याणकारी योजनाओं में बेहतर तरीके से किया जा सकता है और जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को सीमित करता है, तभी समाज के वंचित वर्गों के लिए संसाधन उपलब्ध हो पाते हैं । यही एकमात्र मानसिक शांति, सामाजिक समानता और पर्यावरणीय संतुलन का एक सशक्त मार्ग है।

