मुनियों की रक्षा का प्रतीक – रक्षाबंधन पर्व

आध्यात्मयोगी, राष्ट्रसंत, भारत गौरव, प.पू. गणाचर्य श्री 108 विराग सागर जी गुरुदेव की सुशिष्य पूज्य श्रमणी आर्यिका 105 विशिष्ट श्री माता जी ने आनन्दपुरी, कानपुर नगरी मे अपार जनसैलाब की उपस्थिती मे अपने मंगल उद्बोधन मे कहा –

रक्षाबंधन पर्व बहुत बड़ा इतिहास का दिन है यह पर्व अपनी एतिहासिक घटना को समावेश किए हुए है। यह वात्सल्य पर्व है भाई बहन के पवित्र प्रेम से भी अधिक ऋषि और गुरु पुजा का पर्व है। इसी पर्व पर अकंपनाचार्य आदि 700 मुनिराजों का उपसर्ग दूर हुआ था और हम इस त्योहार को केवल भाई बहनों के नाम से जानते है। इसी त्योहार पर विष्णु कुमार मुनिराज ने वात्सल्य गुणों से 700 मुनिमहाराजों की रक्षा की थी, इसलिये जैन धर्म में वात्सल्य पर्व के नाम से जाना जाता है।

माता जी ने आगे कहा कि रक्षाबंधन खटास का नहीं, मिठास का पर्व है। नेगेटिव का नहीं पॉज़िटिव सोच का पर्व है। बंधन का नहीं, मुक्ति का पर्व है। सूत्र बांधने का नहीं सूत्र मे बन्धने का पर्व है तथा 700 जैन मुनियो की रक्षा का प्रतीक है। भारतीय पर्वो की श्रंखला मे रक्षाबंधन का महत्वपूर्ण स्थान है।

रक्षाबंधन पर्व किसी व्यक्ति, परिवार और समाज विशेष का नहीं , अपितु सम्पूर्ण विश्व मे मनाया जाने वाला पर्व है। हर नगर, समाज, संप्रदाय मे यह बड़े धूमधाम से मनाया जाता। भगवान मुनिसुव्रतनाथ भगवान के काल से संबंध रखने वाला यह पर्व लगभग 57,62,964 वर्ष से अनवरत मनाया जा रहा है। इतनी प्राचीन घटना आज भी लोगों की आस्था की केंद्र बनी है। इस संबंध मे उज्जयनी के राजा शी वर्मा की कथा भी सनाई। हम एक दूसरे के प्रति वात्सल्य भाव रखें मात्र मिठाई खिलाकर व रक्षासूत्र बाँधकर दिन पूरा न करें अपितु धर्म व धर्मात्मा की रक्षा करने का भी कंकल्प करें। आज भगवान श्रेयांसनाथ का मोक्ष कल्याणक भी है। देव शास्त्र गुरु की रक्षा का संकल्प करें तभी हमारा रक्षाबंधन पर्व मनाना सार्थक होगा।

श्रमणी आर्यिका 105 विशिष्ट श्री माता जी

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