मैं कौन हूं, मैं क्या था,मैं क्या होंगा, मेरा वर्तमान स्वरूप क्या है- मुनिपुंगव सुधासागर जी महाराज

जैनी चोखे, खोटे भगवान को जानता है, भगवान गुरु का स्वरूप यह भी अच्छी तरह जानते हैं लेकिन हम अपनी आत्मा का स्वरूप नहीं जान पा रहे हैं अनंत बार भगवान की पहचान करते करते लेकिन अपने आत्मस्वरूप नहीं किया नहीं तो अब तक कल्याण हो गया होता, अपने आत्म स्वरूप को नहीं जाना, अपने आप मे खोट नहीं दिख रहा हैं,मै क्या खोटा हु,मै जैन हु खोटा जैनी तो नहीं ।

आगे की लाइन है पीछे की लाइन हैं हम जानते हैं मैं भी इस लाइन में हुं मे निगोद, नारकीय,भगवान, स्वर्ग का स्वरूप जानते हैं लेकिन स्वयं का स्वरूप नहीं जानते।

दुनिया के संबंध में विचार करते हुए तुम दुनिया में मै भी हूं, जब दुनिया की एक इकाई मैं भी हूं मैं भी दुनिया में आता हूं, मेरा भी कोई दुनिया है हम दुनिया को दुनिया मान रहे हैं लेकिन दुनिया में मैं भी हुं यह नहीं सोच रहा हूं। मैं मुनि हु, प्रतिमा धारी हूं, मैं त्यागी हुं श्रावक हुं यह हर क्षण ध्यान रखना हर पल अपने स्वरूप को नहीं भूलना है कि मे मुनि,त्यागी हु अपने को नहीं भूलना।

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