प्रवचन : बुद्धि को निर्मल बनाकर धर्म के आलंबन से सुख की प्राप्ति होती हैं -आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

जहाजपुर, राजस्थान । आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज जी राजस्थान के जहाजपुर मे 36 साधुओं सहित विराजित है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया 27 जून को 36 वां आचार्य पदारोहण भक्ति भाव पूर्वक मनाया गया । आचार्य श्री ने धर्म सभा को सम्बोधन में बताया कि संसार का प्राणी दुख से घबराता है, सुख चाहता है ,भगवान से भी सुख की कामना करता है।

आचार्य श्री ने बताया की “श्रीमद्” में ‘श्री’ का अर्थ लक्ष्मी होता है और ‘मद’ अर्थात भगवान ने केवल ज्ञान लक्ष्मी को प्राप्त किया है। सभी को अपनी बुद्धि धर्म मार्ग पर लगाना चाहिए। बुद्धि का बहुत महत्व है, बुद्धि के प्रयोग से पाप और पुण्य का भेद समझे। समवशरण में भगवान धर्म देशना देते हैं। वर्तमान में जिनालय देव – शास्त्र – गुरु से धर्म की देशना मिलती है। संसार के दुखों से छुटकारा पाने के लिए सभी को सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र अहिंसामय धर्म से प्राप्त करना होगा।

आपकी आत्मा अजर अमर है, आप ने अनेक जन्मों में अनेक गतियां में भ्रमण किया है। आत्मा छोटे से छोटे जीव मे एवं 500 धनुष से अधिक ऊंचाई के बाहुबली स्वामी मे , सभी के शरीर में आत्मा होती है। यह मंगल देशना वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने स्वस्ति धाम जहाजपुर में आयोजित धर्मसभा में प्रकट की।

राजेश पंचोलिया जी के अनुसार आचार्य श्री ने आगे बताया कि दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्मसागर जी के संस्मरण के माध्यम से बताया कि जब बुद्धि निर्मल होती है, तब वह धर्म का अवलंबन लेते हैं, धर्म को समझने वाला चिरंजी सुख को प्राप्त करता है। वैराग्य को निमित्त समझकर तीर्थंकरों ने संयम धारण किया। वर्तमान में जिनालय से हमें वैराग्य संयम की प्रेरणा मिलती है। इसके लिए आत्मा की शक्ति पहचान कर धर्म का सहारा लेकर परमात्मा बनने का पुरुषार्थ करना चाहिए। पाप छोड़ने से पुण्य मिलता है, इससे बुद्धि में विशुद्धता मिलती है और रत्नत्रयधर्म से शाश्वत सुख मिलता है।

अरिहंत भगवान भी जहाज है, लोगों को भी भव समुद्र से पार कराते हैं – मुनि श्री हितेंद्रसागर जी

इसके पूर्व मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने अपने प्रवचन में बताया कि आत्मा से परमात्मा बनने के लिए धर्म का सहारा लेना होगा। जहाज समुद्र में तैरता है और लोगों को भी तिराता है, अर्थात पार लगाता है। अरिहंत भगवान भी जहाज है वह उन्होंने भी भव संसार रूपी समुद्र को पार किया है और लोगों को भी भव समुद्र से पार कराते हैं। पाप और कषाय से दूर रहना ही धर्म है। छोटे-छोटे नियम का बीजारोपण दीक्षा रूपी वृक्ष बनते हैं।

मुनि श्री के प्रवचन के पूर्व गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तीभूषण माताजी ने अपने प्रवचन में शरीर और आत्मा के स्वरूप की विवेचना की शरीर और आत्मा को भिन्न समझना जरूरी है तभी आप रत्नत्रय मार्ग अपना कर 12 तप और 10 धर्म त्याग, संयम, वैराग्य के माध्यम से मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं।आत्मा के तीन भेद बताएं शुद्ध भाव सिद्ध भगवान के होते हैं, अशुभ भाव से पाप और शुभ भाव से पुण्य की प्राप्ति होती है।

लेख प्रदाता : राजेश पंचोलिया जी, इंदौर

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