निर्मल भाव से किए उपवास का ही पुण्य फल -आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में कहा है कि सामान्यतः व्यक्ति में दो तरह की पीड़ा होती है। एक भीतर की पीड़ा एक बाहर की पीड़ा। अंदर की पीड़ा को दवाई खाकर मिटाया जाता है औऱ बाहरी पीड़ा को को लेप इत्यादी से ठीक करने के प्रयास होते है। इसी तरह मनुष्य के ह्रदय में होने वाली पीड़ा को रत्नत्रय यानी सम्यक दर्शन,सम्यक ज्ञान,सम्यक चरित्र के माध्यम से ही ठीक किया जाता है।

आचार्य श्री ने कहा यदि भोजन न मिलने से पेट खाली है तो उसे उपवास नही कहा जा सकता। भोजन के अभाव की जगह यदि हम मन की भावना से भोजन न कर उपवास करते है तभी उपवास का फल प्राप्त होता है। रागद्वेष छोड़कर, निर्मल भाव से उपवास किया जाए तभी पुण्य फल मिलता है। लेकिन यदि हम किसी लाभ की आशा से उपवास करते है तो हम पाप के भागी होते है।

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