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अगर “अंतिम मैच” में रन नहीं बटोरे तो नैट-प्रेक्टिस अर्थहीन हो जाती है -डॉ. निर्मल जैन

“पापा! यहॉं की सुबह से शाम तक की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में बस घर से निकलते-निकलते भगवान को हाथ जोड़ कर औपचारिकता पूरी करने का ही समय मिल पाता है। पूजा-पाठ न कर पाने का एक अपराध-बोध बना रहता है। यह पीड़ा है अमेरिका की स्थायी निवासी मेरी पुत्री की। पाश्चात्य देशों में घरेलू सेवक रखना अपवाद स्वरूप है। घर के सारे कामकाज खुद ही करने होते हैं। इस लिए व्यस्तता अधिक रहती है। आज पीढ़ी को एक ऐसी धार्मिक आस्था की तलाश है, जो उसके दौड़ते-भागते जीवन के साथ कदम-ताल कर सके। अगर युवा वर्ग को बदलते मूल्यों के साथ चलने वाली धार्मिक आस्था नहीं देंगे तो इसका दोष युवा वर्ग पर नहीं हम पर होगा? हर काल का युवा वर्ग जीवन में कुछ नयापन चाहता है।

धर्म क्रियात्मक एवं गुणात्मक होता हैं। हमारे जीवन में क्रियात्मक धर्म तो हैं लेकिन गुणात्मक धर्म की कमी है। हमारे अंदर जब तक दया, करुणा नही आएगी और पाप नहीं छूटेगा तब तक हमारे पूजन करने से कोई फायदा नहीं। भगवान की पूजन करने से हमारे जीवन से पाखंड मिटना चाहिए।- कुंथुसागर जी

क्रियात्मक धर्म पूजा, सामयिक, आराधना, साधना है, जो निश्चित समय में किया जाता है। जबकि गुणात्मक धर्म समता, प्रसन्नता, क्षमा, दया के भाव हैं, जो कहीं भी किसी भी समय और किसी भी परिस्थितियों में किए जा सकते हैं। निर्धन असहायों की नि:स्वार्थ सेवा करना प्रत्येक धर्म में पुण्य माना जाता है। हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार असहाय लोगों की सेवा कर अपना नैतिक धर्म निभायें।
पूजा-पाठ, सामायिक, आरती यह सब क्रियात्मक धर्म हैं। इनको करने के लिए एक निश्चित समय, स्थान एवं कुछ प्रतीकों, उपकरणों की आवश्यकता होती है। जो हर समय सुलभ नहीं होते हैं। इसलिए अक्सर हम यह क्रियायें नहीं कर पाते। समय की कमी का रोना रोते हुए आत्मा के स्वभाव धर्म को विस्मृत कर दिया जाए? ऐसे कर क्या हम जीवन का वास्तविक आनंद उठा पायेंगे?एक धर्म ऐसा भी है जिसमे समय प्रतीक, उपकरण चाहिए ही नहीं। वह है गुणात्मक धर्म। जिस का पालन हर किया जा सकता है। धर्म का स्मरण करते ही हमारे अंदर जो विनय, सरलता, पवित्रता, नम्रता, कृतज्ञता, करुणा, उदारता के भाव उत्पन्न होते हैं, यह आत्मा के गुण ही गुणात्मक धर्म है। जिन्हे हम कहीं भी, कभी भी, बिना कोई अतिरिक्त साधन जुटाए धारण कर धर्म की प्रभावना कर सकते हैं।

श्रीचरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित नहीं कर पा रहे हैं तो किसी उदास चेहरे को अपनी मुस्कान से फूलों की तरह खिला सकते हैं। देवदर्शन के समय जो विनय और सरलता हम में होती है उसी विनय और सरलता से माता-पिता, गुरुजन के साथ व्यवहार भी धर्म ही करना है। अपने से छोटों से बात करते समय सौजन्यता बरतने में अधिक समय की ज़रुरत कहॉं है। किसी ने हमारे लिए तनिक भी किया तो उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना हमारे व्यक्तित्व को और निखार ही देगा। व्यापार में ग्राहक से नीति-परक वार्ता करने में हमारी गुडविल ही बढ़ती है। कार्य-स्थल में सहकर्मियों से उदारता पूर्ण व्यवहार वातावरण में सौम्यता और कार्य-कुशलता में वृद्धि करता है। भगवान, संपत्ति छोड़ने से नहीं अपने होते। हम भगवान की निकटता पाते हैं इस बात से कि हमने अपनी उदारता से कितनों को जोड़ा है।

क्रियात्मक धर्म नैट-प्रेक्टिस के समान है। नैट-प्रेक्टिस में हम कितने भी शतक बनालें अगर “अंतिम मैच” में रन नहीं बटोरे तो नैट-प्रेक्टिस अर्थहीन हो जाती है। ऐसे ही अगर क्रियात्मक धर्म की प्रतिक्रिया या प्रतिछाया गुणात्मक धर्म में नहीं आई तो क्रियात्मक धर्म का कोई लाभ नहीं। गुणात्मक धर्म एक चुनोती है जिसे हमें हर समय धारण किए रहना होता है और जब यह हमारे स्वभाव में एकाकार हो जाता है तो केवल हम पर ही नहीं, हमारे चारों ओर निरंतर अवाध रूप से अपनी आभा बिखेरता रहता है। हम जितना इस में सफलता प्राप्त करते हैं उतना ही प्रभु के करीब तो होते ही हैं, स्वयं अपने और समाज के लिए भी सुख का कारण बनते हैं।

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